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कब मनाया जायेगा देव दीपावली का पर्व ? Dev Diwali 2023

Last updated on November 24, 2023 by Editor

देव दीपावली का पर्व कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। साल 2023 में 26 नवंबर को पूर्णिमा तिथि पड़ रही है।इस दिन देव दीपावली का पर्व मनाया जाएगा।

देव दीपावली, जो की प्राचीन बनारस के शहर में मनाया जाता है, एक महत्त्वपूर्ण पर्व है जो की पूरे धार्मिक महत्व के साथ मनाया जाता है। यह पर्व कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है, जो की हिन्दू कैलेंडर के अनुसार नवंबर या दिसंबर महीने में आता है।

देव दीपावली का पर्व पूर्व वर्तमान काल में बहुत ही धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव माना जाता है। इस दिन बनारस के घाटों पर आरती, दीपदान, पूजा, और धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। बहुत से लोग अपने पितृगणों (अंतिम संस्कार में शुद्धि प्राप्त किये गए पूर्वजों) की यात्रा करने के लिए बनारस आते हैं और गंगा की सफाई और संरक्षण के लिए ध्यान देते हैं।

इस पर्व की कथा विभिन्न पुराणों में मिलती है, लेकिन एक प्रमुख कथा के अनुसार, इस दिन देवताओं का महान समागम होता है। अनुसार, इस दिन देवी गंगा धरती पर अपनी अद्भुतता और शक्ति को प्रकट करती हैं। इस दिन, गंगा नदी को अपनी पूर्णता के साथ देवताओं द्वारा संतुलित किया गया माना जाता है, और इसी कारण से देव दीपावली का पर्व बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

यहां तक की शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन पर गंगा नदी का पानी अमृत समान होता है, और इसलिए गंगा घाटों पर इस दिन के अवसर पर लोग दीपों का जलाने, आरती, पूजा-अर्चना करते हैं। इस अवसर पर बनारस के घाटों पर अनगिनत दीपों की रोशनी से सजता है।

यह पर्व भारतीय संस्कृति में अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है और बनारस के लोगों के लिए यह एक विशेष और पवित्र समय होता है।

Table of Contents

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  • देव दीपावली का पर्व: कथा और महत्व
  • पर्व की कथा:
  • पर्व का महत्व:
  • महत्वपूर्ण समारोह:
  • काशी में क्यों मनाते हैं देव दीपावली?

देव दीपावली का पर्व: कथा और महत्व

देव दीपावली, जो की प्राचीन बनारस के शहर में मनाया जाता है, एक महत्त्वपूर्ण पर्व है जो की पूरे धार्मिक महत्व के साथ मनाया जाता है। यह पर्व कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है, जो की हिन्दू कैलेंडर के अनुसार नवंबर या दिसंबर महीने में आता है।
देव दीपावली के दिन घर पर घी या सरसों के तेल के 11 दीपक जलाएं। पहले मिट्टी के दिए को मां तुलसी के पास रखें। इसके बाद एक दिए को घर के दरवाजे के बाहर रखें। बाकी बचे 9 दीयों को आप मंदिर में रख दें। इसके बाद विष्णु सहस्रनाम और लक्ष्मी चालीसा का पाठ करें। ऐसा करने से आपका भाग्य समृद्ध होगा और घर में मां लक्ष्मी का वास होगा।

पर्व की कथा:

इस पर्व की कथा विभिन्न पुराणों में मिलती है, लेकिन एक प्रमुख कथा के अनुसार, इस दिन देवताओं का महान समागम होता है। अनुसार, इस दिन देवी गंगा धरती पर अपनी अद्भुतता और शक्ति को प्रकट करती हैं। इस दिन, गंगा नदी को अपनी पूर्णता के साथ देवताओं द्वारा संतुलित किया गया माना जाता है, और इसी कारण से देव दीपावली का पर्व बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

पर्व का महत्व:

यहां तक की शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन पर गंगा नदी का पानी अमृत समान होता है, और इसलिए गंगा घाटों पर इस दिन के अवसर पर लोग दीपों का जलाने, आरती, पूजा-अर्चना करते हैं। इस अवसर पर बनारस के घाटों पर अनगिनत दीपों की रोशनी से सजता है।देव दीपावली यानी कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा नदी में स्नान करने के बाद 11 दीपों का दान करें। फिर नदी किनारे स्थित किसी मंदिर में पूजा अर्चना कर घर लौट जाएं। घर जाकर मां तुलसी के गमले और मंदिर में घी का दीया जलाएं। ऐसा करने से मां लक्ष्मी की कृपा होगी।

महत्वपूर्ण समारोह:

देव दीपावली का पर्व भारतीय संस्कृति में अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है और बनारस के लोगों के लिए यह एक विशेष और पवित्र समय होता है। इस दिन, बनारस के घाटों पर अनगिनत दीपों की रोशनी से सजता है और धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। बहुत से लोग इस अवसर पर अपने पितृगणों की यात्रा करते हैं और गंगा की सफाई और संरक्षण के लिए ध्यान देते हैं।

काशी में क्यों मनाते हैं देव दीपावली?

कार्तिक पूर्णिमा को पड़ने वाली देव दीपावली को त्रिपुरारी पूर्णिमा के नाम से भी जानते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, त्रिपुरारी पूर्णिमा नाम के पीछे एक पौराणिक कथा है। इस कथा के अनुसार त्रिपुरासुर नाम का एक राक्षस था जिसके अत्याचारों से हर कोई परेशान हो गया था। ऐसे में हर कोई चाहता था कि उसके आतंक से मुक्त मिल जाए। ऐसे में भगवान शिव की आराधना की गई और फिर उन्होंने त्रिपुरासुर का वध किया और हर किसी को उसके आतंक से मुक्ति मिल गई। इसी कारण भगवान शिव को त्रिपुरारी नाम से भी जानते हैं। भगवान शिव ने जब इस राक्षस का संहार किया तो उस दिन कार्तिक पूर्णिमा का दिन था। राक्षस के वध के बाद सभी देवी देवता प्रसन्न होकर काशी आए थे और दीप जलाकर खुशियां मनाई थी। इसी कारण हर साल कार्तिक पूर्णिमा के दिन काशी में दीपोत्सव मनाया जाता है।

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